छत्तीसगढ़, बिलासपुर, जुलाई, 21/2025
बिलासपुर में पुलिसकर्मी पर नाबालिगों को बंधक बनाकर काम कराने का आरोप… छह महीने तक नाबालिग बच्चियों से बंधुआ मजदूरी का चौंकाने वाला मामला… एसएसपी ने कहा होगी कार्रवाई…
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से एक बेहद चौंकाने वाला और मानवता को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है, जिसमें पुलिसकर्मी पर दो नाबालिग बच्चियों को छह महीने तक बंधक बनाकर उनसे जबरन घरेलू काम कराने का गंभीर आरोप लगा है। ये बच्चियां जशपुर जिले की रहने वाली हैं और किसी तरह बचकर निकलने के बाद तोरवा थाना पहुंचीं, जहां उन्होंने अपनी आपबीती सुनाई
पीड़ित बच्चियों का कहना है कि उन्हें बेहतर जीवन और काम के बहाने उनके गांव से बहला-फुसलाकर बिलासपुर लाया गया। लेकिन यहां आने के बाद उन्हें पुलिस क्वार्टर में रखा गया, जहां उन्हें छह महीने तक झाड़ू-पोछा, बर्तन धोना, कपड़े साफ करना और अन्य घरेलू कार्य करने के लिए मजबूर किया गया।
बच्चियों ने आरोप लगाया है कि दिनभर काम के बाद भी यदि वे थककर बैठ जाती थीं या कोई काम ठीक से नहीं हो पाता, तो पुलिसकर्मी और उनके परिवार के सदस्य उन्हें बेरहमी से पीटते थे। यहां तक कि कई बार उन्हें खाना भी नहीं दिया जाता था। इस दौरान उन्हें स्कूल जाने या अपने परिवार से संपर्क करने की अनुमति भी नहीं दी गई।
एसएसपी ने कहा होगी कार्रवाई…
इस मामले में एसएसपी रजनेश सिंह ने बताया की जानकारी मिलने पर तत्काल पेट्रोलिंग भेजी गई थी जिसमें एक महिला प्रधान आरक्षक साथ थी जो बच्चियों से पूछताछ की उन्होंने बताया कि अरुण लकड़ा जो कि पुलिस लाइन में आरक्षक के पद पर पदस्थ है वो बच्चियों का रिश्ते में मामा लगता है उनके पैरेंट्स ने ही अच्छी पढ़ाई लिखाई के लिए बिलासपुर भेजा था। बच्चियों का कहना है कि उनसे घर का सारा काम कराया जाता है और मारपीट भी की जाती थी मामले में पुलिस सूक्ष्मता से जांच कर रही है जो भी दोषी होगा उस पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
तोरवा थाने में किया खुलासा
रविवार की रात किसी तरह दोनों बच्चियां उस घर से भागकर तोरवा थाने पहुंचीं और अपनी पूरी आपबीती पुलिस को सुनाई। बच्चियों की हालत देखकर पुलिस भी स्तब्ध रह गई। इसके बाद मामला तूल पकड़ने लगा और अब यह प्रदेशभर में चर्चा का विषय बन गया है।
मानव तस्करी की आशंका, कई सवाल खड़े
इस मामले में मानव तस्करी की भी गहरी आशंका जताई जा रही है। सामाजिक संगठनों का कहना है कि यह एक सुनियोजित रैकेट हो सकता है, जो गरीब और आदिवासी परिवारों की बच्चियों को बहला-फुसलाकर बंधुआ मजदूरी के लिए दूर के शहरों में भेजता है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि इस पूरे मामले में जिन पर सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है – यानी पुलिसकर्मी – उन्हीं पर इस अमानवीय कृत्य का आरोप लगा है। इससे न सिर्फ पुलिस विभाग की छवि धूमिल हुई है, बल्कि आम जनता का भरोसा भी डगमगाया है।
पुलिस कर रही जांच
फिलहाल, पुलिस विभाग की ओर से मामले की आंतरिक जांच शुरू की गई है और बाल आयोग की रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो दोषी पुलिसकर्मियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
यह मामला सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि जिन हाथों में न्याय की जिम्मेदारी है, अगर वही अत्याचार पर उतर आएं, तो व्यवस्था की जड़ें हिल सकती हैं। ऐसे में समाज और शासन दोनों की यह सामूहिक जिम्मेदारी है कि पीड़ित बच्चियों को न्याय दिलाने के साथ-साथ भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न होने दी जाए।
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