बिलासपुर, नवंबर, 07/2025
हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: हिमांशु मांडले हत्याकांड में सभी पांच आरोपी बरी, जेल से रिहाई का आदेश
बिलासपुर। बालोद के बहुचर्चित हिमांशु मांडले हत्याकांड में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर ने बुधवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने जिला एवं सत्र न्यायालय बालोद द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सज़ा को रद्द करते हुए सभी पाँचों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। फैसले के साथ ही न्यायालय ने सभी को तुरंत रिहा करने का आदेश जारी किया।
क्या है पूरा मामला…
21 दिसंबर 2020 को बालोद के तांदुला जलाशय किनारे व्यायाम शिक्षक हिमांशु मांडले का शव बरामद हुआ था। शव पर सिर में गंभीर चोट के निशान पाए गए थे। पुलिस ने इस मामले को हत्या मानते हुए जांच शुरू की थी।
तत्कालीन पुलिस अधीक्षक जितेंद्र सिंह मीणा के नेतृत्व में गठित टीम ने 48 घंटे के भीतर मामले का खुलासा करने का दावा किया था। पुलिस विवेचना में मृतक की पत्नी माधुरी मांडले और उसके मित्र लोकेंद्र पटेल (डांस टीचर) को मुख्य आरोपी बताया गया। आरोप था कि दोनों के बीच अवैध संबंध थे और दोनों ने मिलकर रायपुर से कुछ युवकों को बुलाकर शराब पार्टी के दौरान हिमांशु मांडले की हत्या कर दी। पुलिस ने दावा किया था कि वारदात को अंजाम देने के लिए 1000 रुपये अग्रिम भुगतान किया गया था।
निचली अदालत ने सुनाई थी आजीवन कारावास
पुलिस जांच के आधार पर माधुरी मांडले, लोकेंद्र पटेल और रायपुर के तीन सहयोगियों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया गया। मामले की लंबी सुनवाई के बाद जिला एवं सत्र न्यायालय बालोद ने पाँचों आरोपियों को हत्या के अपराध (धारा 302, भा.दं.सं.) में दोषी पाते हुए आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी।
इस निर्णय के विरुद्ध आरोपियों ने उच्च न्यायालय बिलासपुर में अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट ने पलटा फैसला
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने 6 नवंबर 2025 को सुनाए अपने फैसले में निचली अदालत के निर्णय को पूरी तरह निरस्त करते हुए पाँचों आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त कर दिया। न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में विफल रहा और जांच में कई गंभीर खामियाँ थीं। इस प्रकरण में आरोपी गोविंद सोनी उर्फ कालू और कृष्णकांत शर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉली अभिषेक सोनी (उच्च न्यायालय जबलपुर) ने पैरवी की।
जल्दबाजी में झूठा फंसाया गया
निर्णय के बाद अधिवक्ता डॉली अभिषेक सोनी ने मीडिया से कहा, मेरे मुवक्किलों को पुलिस ने जल्दबाजी में झूठे आरोप में फंसा दिया था। पुलिस पर केस जल्द सुलझाने का दबाव था, इसलिए बिना ठोस सबूत के निर्दोषों को आरोपी बना दिया गया। न्यायालय ने आज सत्य को स्वीकार किया है और यह न्यायिक व्यवस्था में विश्वास को मजबूत करता है।
पुलिस जांच पर उठे सवाल…
उच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद पुलिस की प्रारंभिक विवेचना पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। मामले में अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी ने ठोस वैज्ञानिक और प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए, जिसके कारण संदेह का लाभ आरोपियों को दिया गया।
इस बहुचर्चित हत्याकांड में आए इस नए फैसले के बाद अब पूरा मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है।
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