बिलासपुर, जून, 22/2026
कोल वाशरी की धूल से बेहाल गांव,, विकास चाहिए, लेकिन विनाश नहीं,, कोल वाशरी विस्तार और जनसुनवाई के खिलाफ एकजुट हुए ग्रामीण…
स्वास्थ्य, खेती और जल स्रोतों पर संकट का आरोप; बोले- पहले मौजूदा हालात की हो स्वतंत्र जांच
बिलासपुर। जिले के कर्रा, गतौरा, फरहदा, खैरा, लगरा और आसपास के गांवों में रहने वाले लोगों का जीवन हिंद एनर्जी एंड कोल बेनिफिकेशन लिमिटेड की कोल वाशरी से निकलने वाली धूल और प्रदूषण के बीच गुजर रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि कोयले की महीन धूल घरों, खेतों और जल स्रोतों तक पहुंच रही है, जिससे स्वास्थ्य और पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ रहा है। लोगों का कहना है कि सुबह घरों की सफाई से लेकर पीने के पानी को सुरक्षित रखने तक हर काम प्रदूषण की चुनौती के बीच करना पड़ रहा है। घरों की छतों, आंगनों, पेड़-पौधों और खेतों पर जमी काली परत उनकी चिंता बढ़ा रही है। ग्रामीणों के मुताबिक क्षेत्र में सांस संबंधी बीमारियां, एलर्जी, आंखों में जलन और लगातार खांसी की शिकायतें बढ़ रही हैं, जिनका सबसे ज्यादा असर बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ रहा है।
स्कूलों तक पहुंचा प्रदूषण, बच्चों के स्वास्थ्य पर खतरा…
ग्रामीणों और अभिभावकों का कहना है कि खुले मैदानों और स्कूल परिसरों में उड़ती कोयले की धूल बच्चों की सेहत और पढ़ाई दोनों को प्रभावित कर रही है। डॉक्टर एल.पी. कुमार के अनुसार यह महीन धूल सीधे फेफड़ों तक पहुंचती है, जिससे सांस लेने में परेशानी और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। कई परिवारों का कहना है कि बढ़ती बीमारियों के कारण उन्हें बार-बार स्वास्थ्य केंद्रों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। दूसरी ओर किसानों का आरोप है कि कोयले की धूल खेतों तक पहुंचने से फसलों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। ग्रामीणों ने भूजल स्तर गिरने, जल स्रोतों के प्रभावित होने और कोयलायुक्त पानी के उपयोग की शिकायतें भी सामने रखी हैं। स्थानीय नदी-नालों की स्थिति को लेकर भी लोगों ने चिंता जताई है।

विस्तार योजना का विरोध, बोले- जनसुनवाई केवल औपचारिकता…
इसी बीच हिंद एनर्जी एंड कोल बेनिफिकेशन लिमिटेड की प्रस्तावित विस्तार योजना को लेकर ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि जब मौजूदा स्थिति में ही प्रदूषण और पर्यावरणीय समस्याएं गंभीर हैं, तब क्षमता विस्तार से हालात और बिगड़ सकते हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि किसी भी औद्योगिक परियोजना के विस्तार से पहले प्रभावित गांवों की वास्तविक सहमति नहीं ली जाती और जनसुनवाई महज औपचारिकता बनकर रह गई है। क्षेत्रवासियों ने मांग की है कि प्रदूषण, जल स्रोतों की स्थिति और स्वास्थ्य प्रभावों से जुड़े सभी तथ्यों को सार्वजनिक किया जाए तथा स्वतंत्र जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जाए। उनका कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ऐसा विकास स्वीकार्य नहीं है जिसकी कीमत गांवों के स्वास्थ्य, किसानों की जमीन और आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़े।

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