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मौत के बाद भी नहीं मिली मुक्ति,,  बिल नहीं चुकाने पर आदिवासी महिला का शव रोकने के आरोपों से घिरा हरि ओम हॉस्पिटल ?…

बिलासपुर, जुलाई, 31/2026

मौत के बाद भी नहीं मिली मुक्ति,,  बिल नहीं चुकाने पर आदिवासी महिला का शव रोकने के आरोपों से घिरा हरि ओम हॉस्पिटल ?…

बिलासपुर। न्यायधानी बिलासपुर में इलाज के दौरान एक आदिवासी महिला की मौत के बाद उसके शव को निजी अस्पताल में रोके रखने के आरोपों ने स्वास्थ्य सेवाओं की संवेदनशीलता और निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कोरिया जिले की रहने वाली 47 वर्षीय तिल बसिया बाई, पति जगन्नाथ, की मौत के बाद शव को कथित रूप से 24 घंटे से अधिक समय तक अस्पताल में रखने के मामले ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी हलचल मचा दी है। हालांकि अस्पताल प्रबंधन ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताते हुए कहा है कि मामला मेडिको-लीगल (एमएलसी) होने के कारण पुलिस और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक शव परिजनों को सौंपा ही नहीं जा सकता था।

जानकारी के अनुसार, 25 जुलाई को महिला अपने गांव में पेड़ से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गई थी। प्राथमिक उपचार के बाद परिजन उसे बेहतर इलाज की उम्मीद में कोरिया जिले से बिलासपुर स्थित तोरवा थाना क्षेत्र के हरिओम हॉस्पिटल लेकर पहुंचे, जहां पिछले चार दिनों से उसका उपचार चल रहा था। चिकित्सकों के प्रयासों के बावजूद 29 जुलाई की सुबह उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई।

मृत्यु के बाद विवाद तब शुरू हुआ जब यह आरोप सामने आया कि अस्पताल प्रबंधन ने इलाज का बकाया बिल जमा नहीं होने के कारण महिला के शव को अस्पताल परिसर में ही रोककर रखा। बताया गया कि अस्पताल का कुल बिल करीब 84 हजार रुपये बना था, जबकि परिजनों ने केवल 5 हजार रुपये ही जमा किए थे। इस बीच शव को समय पर पोस्टमार्टम या सरकारी अस्पताल की मर्च्युरी नहीं भेजे जाने को लेकर सवाल उठने लगे।

मामले की जानकारी मिलने पर जिला कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष विजय केशरवानी अस्पताल पहुंचे। उन्होंने बताया कि सांसद ज्योत्सना महंत को घटना की सूचना मिलने के बाद उनके निर्देश पर वे अस्पताल पहुंचे और पूरे घटनाक्रम पर नाराजगी जताते हुए प्रशासन से जांच और कार्रवाई की मांग की। उनका कहना था कि यदि महिला की मृत्यु हो चुकी थी तो शव को तत्काल सरकारी अस्पताल की मर्च्युरी भेजा जाना चाहिए था। उन्होंने आरोप लगाया कि बिल भुगतान नहीं होने के कारण शव को अस्पताल में रोके रखा गया, जो पूरी तरह अमानवीय और संवेदनहीन रवैया है।

गांव-गांव में सक्रिय निजी अस्पतालों के एजेंट ?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि कोरिया जिले से करीब 200 किलोमीटर दूर स्थित बिलासपुर के हरिओम अस्पताल में ही मरीज कैसे पहुंचा? एंबुलेंस चालक मरीज को जिला अस्पताल या सिम्स ले जाने के बजाय सीधे निजी अस्पताल क्यों ले गया ? आखिर मरीज को निजी अस्पताल पहुंचाने का निर्णय किसके कहने पर लिया गया ?

यह भी जांच का विषय है कि क्या गांव-गांव में निजी अस्पतालों के एजेंट सक्रिय हैं ? जो मरीजों को एक विशेष अस्पताल में भेजने का काम करते हैं। यदि ऐसा है, तो क्या इसके पीछे कमीशन का खेल चल रहा है ? जहां मरीजों को निजी अस्पतालों में भर्ती कर इलाज के नाम पर मोटे बिल थमाए जाते हैं ? इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है। यदि ऐसा हो रहा है तो शासन को इस ओर ध्यान देना जरूरी है और इस पर कार्रवाई भी।

 

 

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Lokesh war waghmare - Founder/ Editor

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