बिलासपुर, अप्रैल, 02/2026
ब्रेकिंग : 23 साल पुराने हत्याकांड में बड़ा फैसला,, अमित जोगी को लगा झटका,, हाईकोर्ट का सख्त आदेश 3 हफ्ते में करें सरेंडर…
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की सियासत को दो दशक पहले झकझोर देने वाले बहुचर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में गुरुवार को एक बड़ा और निर्णायक मोड़ आ गया। बिलासपुर हाईकोर्ट की स्पेशल डिवीजन बेंच ने इस मामले में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसीजे) के अध्यक्ष अमित जोगी को तीन सप्ताह के भीतर सरेंडर करने के निर्देश दिए हैं। इस फैसले के बाद प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है।
मुख्य न्यायाधीश की डिवीजन बेंच ने सीबीआई की अपील पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि मामले में उपलब्ध साक्ष्य और गवाहों के आधार पर अमित जोगी की संलिप्तता सिद्ध होती है। अदालत ने आदेश दिया कि वे 21 दिनों के भीतर संबंधित न्यायालय में आत्मसमर्पण करें।
यह फैसला उस समय आया है जब पहले ट्रायल कोर्ट ने उन्हें साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया था।
23 साल पुराना सनसनीखेज मामला…
यह मामला 4 जून 2003 का है, जब एनसीपी नेता रामावतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड ने उस समय प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दिया था।
मामले में कुल 31 आरोपियों को नामजद किया गया था, जिनमें से दो आरोपी—बल्टू पाठक और सुरेंद्र सिंह—सरकारी गवाह बन गए थे।
सतीश जग्गी…
ट्रायल कोर्ट से हाईकोर्ट तक लंबी लड़ाई…
31 मई 2007 को रायपुर की विशेष अदालत ने 28 आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी, लेकिन अमित जोगी को पर्याप्त सबूत न होने के कारण बरी कर दिया गया था।
इसके बाद मृतक के बेटे सतीश जग्गी ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को पुनः सुनवाई के लिए हाईकोर्ट भेज दिया था। लंबी कानूनी प्रक्रिया और वर्षों की सुनवाई के बाद अब जाकर यह अहम फैसला सामने आया है।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब अमित जोगी के पास सीमित विकल्प बचे हैं। यदि वे सुप्रीम कोर्ट से तत्काल राहत नहीं लेते हैं, तो उन्हें 3 सप्ताह के भीतर सरेंडर करना अनिवार्य होगा।इस फैसले के बाद छत्तीसगढ़ की राजनीति में फिर से उबाल आ गया है। विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों की नजरें अब इस मामले के अगले कानूनी कदम पर टिकी हैं।
हाईकोर्ट के इस फैसले पर अमित जोगी ने x पर ट्वीट कर कहा हैं कि
आज माननीय उच्च न्यायालय ने मेरे विरुद्ध CBI की अपील को मात्र 40 मिनट में स्वीकार कर लिया- बिना सुनवाई का अवसर दिए।
मुझे खेद है कि जिस व्यक्ति को अदालत ने दोषमुक्त किया था, उसे बिना सुनवाई का एक भी अवसर दिए दोषी करार दिया गया। यह अप्रत्याशित है।
अदालत ने मुझे 3 सप्ताह के अंदर सरेंडर करने का समय दिया है।
मुझे लगता है कि मेरे साथ गंभीर अन्याय हुआ है। मुझे पूरा विश्वास है कि सर्वोच्च न्यायालय से मुझे न्याय अवश्य मिलेगा।
मैं न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास रखता हूँ। मैं पूर्ण शांति, आस्था और धैर्य के साथ आगे बढ़ रहा हूँ।
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