नक्सलवाद का दंश झेल रही आदिवासी छात्राओं को अब प्रशासनिक आतंकवाद का भी दर्द सहना पड़ रहा

    बिलासपुर / नक्सलवाद का दंश झेल चुकी आदिवासी छात्राओं को अब प्रशासनिक आतंकवाद और अफसरशाही का दर्द झेलना पड़ रहा है। ताजा उदाहरण छत्तीसगढ़ के कोर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से आई आदिवासी छात्राओं की उपेक्षा से जुड़ा हुआ है। सरकार ने इनके पढ़ने और रहने के लिए बिलासपुर में प्रयास आवासीय विद्यालय की व्यवस्था की है। लेकिन यहां की प्रिंसिपल और सरकारी अधिकारियों की मनमानी, अत्याचार और यातनाओं से परेशान इन आदिवासी छात्राओं ने मोर्चा खोल दिया है। ये आदिवासी छात्राएं जिन्हें पकड़ कर पुलिस की गाड़ियों में डाला जा रहा है। इनका अपराध केवल इतना है कि इन्होंने अपने प्रिंसिपल के अत्याचार और सरकारी अधिकारियों की मनमानी के खिलाफ आवाज उठाई है। इन छात्राओं का आरोप है कि इन्हें ना तो पीने का साफ पानी मिलता है, ना खाने की व्यवस्था है ठीक रखी गई है। इतना ही नही इन्हें पढ़ने के लिए पुस्तकें भी उपलब्ध नही कराई जा रही है। इन सबके ऊपर इन्हें इंटरनेट और मोबाइल का प्रयोग भी नहीं करने दिया जा रहा है। छात्राओं पर तुगलकी फरमान जारी करने वाली प्रिंसिपल जया सिंह की शिकायत इन्होंने पहले भी की है। लेकिन अधिकारियों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया और आखिरकार इन भोले भाले आदिवासी छात्राओं का सब्र का बांध टूट गया। और इन्होंने सुबह 4 बजे अपने स्कूल कैंपस की महिला चौकीदार को कुर्सी से बांधकर बाहर सड़कों पर उतर आईं। इस बीच स्कूल के प्रिंसिपल ने पुलिस को फोन कर दिया और पुलिस ने इन्हें रास्ते पर ही रोक लिया। नाराज छात्राएं कलेक्टर के पास जाने के लिए निकली थी और इन्हें थाने पर ही रोक कर विभागीय अधिकारी और पुलिस के द्वारा दबाव बनाने का प्रयास किया गया । लेकिन नाराज छात्राओं ने उनकी एक नहीं सुनी और सीधे कलेक्टर कार्यालय पहुंच गई । जहां विभाग के किसी भी अधिकारी से इन्होंने चर्चा करने से साफ मना कर दिया। इनकी मांग थी कि कलेक्टर ही फरियाद सुने और उनकी समस्याओं का निराकरण किया जाए । लिहाजा जिला कलेक्टर संजय अलंग यहां पहुंचे और उन्होंने उनकी समस्याएं सुनी और आश्वासन दिया कि 3 दिन के भीतर पूरे मामले की एसडीएम स्तर के अधिकारियों से जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी । वहीं विभागिय अधिकारी इसे एक घटना मान रहे हैं। इनकी मानें तो बच्चों को थोड़ा संयम बरतना चाहिए। अगर थोड़ी बहुत दिक्कतें होती भी है तो उन्हें इसकी आदत हो जानी चाहिए। कुल मिलाकर देखा जाए तो यहां बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा लगाने वाली छत्तीसगढ़ सरकार फेल होती हुई नजर आ रही है।

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